Monday, July 25, 2011

सुन- सुन री सखी पावस आयो !! (Sun Sun Ri Sakhi Pawas Aaayo !!) Suryadeep Ankit Tripathi


सुन- सुन री सखी पावस आयो !! 
झर-झर झंकृत, हो मेघ अलंकृत
धरा विचर, पावस आयो !!
करि अट्टहास जलद, जल भरी-भरी,
धरा सुधा बरसायो !!
सुन- सुन री सखी पावस आयो......                                                

हुई धन्य धरा, धन धान सुखद
मन देख हरित मुस्कायो
खग-वृंद गगन कलरव सुन्दर
कर नृत्य मयूर उछावो !!  
सुन- सुन री सखी पावस आयो...... 

पुलक कुसुम, सुन गुन-गुन गुंजन,
भ्रमर पराग नहायो,       
लता पाश कर वृक्ष आलिंगन,
फल-फूल नेह उपजायो !!
सुन- सुन री सखी पावस आयो......                                                

ये मधुर ऋतू, पावस पावन  
मन प्रेम अगन, प्रिय शीत पवन 
हिय बैठ हिंडोले डोल रहा,
कछु ठौर नाहीं ठहरावो !!
सुन- सुन री सखी पावस आयो...... 
मन पिया रमण उकसायो...
सुन- सुन री सखी पावस आयो...... 

सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - २३/०७/२०११ 

Thursday, July 21, 2011

तुझको कसम है माँ के लाल ... (Tujhko Kasam Hai Maa Ke Laal)


तुझको कसम है माँ के लाल ....
(पाकिस्तान की दगाबाजी और उद्दंडता पर)
खंड-खंड कर वो खंड, प्रचंड वार एक कर,
रक्त क्यूँ न खौलता, दशा ये देश, देख कर !!
भुजंग वो उद्दंड वो, कलंक है धरा पे वो,
है मृत्युदंड इक विकल्प, प्रयत्न सारे देख कर !!

(अहिंसा-गाँधी) नहीं हिंसा (भगत सिंह) पर
है अस्त्र-शस्त्र का ये युग, इक काठ वो दंड नहीं,
दंड से भले हुए है सभ्य, इक उद्दंड नहीं !!
शस्त्र आज थाम ले, सम सिंह इक हुँकार कर,
नोच-नोच बोटियाँ, तज जल, तू रक्त पान कर !!

(साम-दाम और भेद के निष्फल होने पर)
नहीं है मान शास्त्र का, तो शस्त्र पर यकीन कर,
जता दे रोष, कर के घोष, अंबर-धरा तू एक कर !!
तू एक कर जन की आवाज़, देर एक भी पल न कर,
मिटा दे दुश्मनी जहाँ से, दुश्मनों का नाश कर !!

(सुस्त एवं अदूरदर्शित राजनीति के लिए)
ये खून हैं इस देश का, नहीं हैं जल जो बहा करे,
राजनीति का ये दंड, निर्दोष क्यों सहा करें !!
बदल दे अंध राज को, तू फिर से राम-राज कर,
भवि हो तेरा तेजमय, तू कल करे सो आज कर !!

(नौजवान (सिपाही) एवम गर्म खून के लिए)
सूर्य से तू लेके ज्वाल, ज्वार सिंध का झपट,
कर श्रृंग सा अटल तू मन, तूफ़ान से तू ले लिपट !!
जलेगा एक दीप पर, असंख्य दीप सा प्रखर,
संवरेगा मेरा देश फिर, युवक गया जो एक निखर !!
युवक गया जो एक निखर.....
तुझको कसम है माँ के लाल, तू फिर से एक काम कर,
दे मान फिर से देश का, तू शीश इसके नाम कर !!

सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - २१/०७/२०११

Wednesday, July 13, 2011

आँसू ..... (AANSU)... BY SURYADEEP ANKIT TRIPATHI


आँसू .....

मेरी पलकों से गिर गया आँसू....
रेत में जाके... खो गया आँसू.....
1. कई लम्हों से, घर बनाये था,
मेरी पलकों में वो समाया था...
आज बिखरा तो, रुक नहीं पाया...
रोया फिर फूट-फूट वो आंसूं.....

2. जब तलक दर्द है..ये रहता है.
संग जख्मों की, टीस सहता है,
दर्द, बेदर्द जब लगे होने,
बनके तब -तब बहा, लहू आँसू...

3. कभी खुशियों के घर भी आता है...
साथ तोहफे हँसी के लाता है ...
गर हँसीं हद से जो लगे बढ़ने,
खुद भी रोये, और रुलाये आँसूं....

4. बदनसीबी का हाल न पूछो,
इससे इसका पता नहीं पूछो,
कभी एक बूंद है, कभी दरिया,
कभी खारा सा समंदर आँसू ....

मेरी पलकों से गिर गया आँसू....
रेत में जाके... खो गया आँसू.....

सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी... १३/०७/२०११

Tuesday, July 5, 2011

गर्दिश !!GARDISH - BY SURYADEEP ANKIT TRIPATHI

गर्दिश !!
दिल के जख्मों को, सरेआम, नुमाया नहीं करते !
दाग उल्फत के ज़माने को, दिखाया नहीं करते !!

पल दो पल के लिए, आँसू भी बहा देगा कोई !
साथ साए भी कभी दिन ढले, आया नहीं करते !!

छोड़ दे जिद ये, ज़माने को बदल ने की तू,
जागी आँखों में कोई, ख्वाब, सजाया नहीं करते !!




एक घंरोंदे को बनाने के लिए, इक उम्र है कम,
वक्त- बेवक्त ख़ुदा को ये, जताया नहीं करते !!

लाख समझाया था दिल को, कि मुहोब्बत ना कर,
आशियाँ खुद कभी अपना, यूँ, जलाया नहीं करते !!

मेरे दुश्मन मेरे मरने की दुआएं मांगें,
मेरे अपने, मेरे जीने की, दुआएं नहीं करते !!

छोड़ नफरत मेरी खातिर, दो घडी आके तू मिल,
जिन्दगी चार दिन की है, इसे जाया नहीं करते !!

सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - ०५/०७/२०११

Tuesday, June 21, 2011

शराब और टूटते ख्वाब.... Sharaab aur Tootte Khwab...

प्रिय मित्रो
नमस्कार !!!
लाल पानी, शराब, जैसा कि प्रवेश जी ने अपनी कविता में लिखा था... कि घर घर में पहुँच गई है. 
और इंसान ने इसे अपनाकर अपने आपको बदल दिया है... वो कैसा था..कैसा हो गया है... 
एक शराबी के घर कि स्तिथि क्या हो सकती है, ये मेरी लिखी गई पंक्तियों से विदित है...
अमीरों पर इसका असर नहीं होता, क्योंकि भरे पेट ये ज्यादा असर नहीं करती, लेकिन... एक गरीब 
जो मुश्किल से दिन में एक वक्त का भोजन जुटाता है, वहां ये ज्यादा असर करती है... और वो बेचारा 
भूखे पेट को कभी पानी से तो कभी इसी शराब से भरता है.. ताकि अगली सुबह वो फिर उठ सके और 
निकल सके दो पैसे कमाने को....और फिर लग जाती है उसे लत, और फिर दिखता है, घर में, बच्चों पर इसका असर. 

शराब और टूटते ख्वाब....

इंसां की बदलती तस्वीरें
एक रंग नहीं कुछ ठहरा सा ! 
कल गंगाजल था कलश भरा
अब गंदाजल कुछ बिखरा सा !! ... 

भूख नहीं है घर में मेरे,
एक चटाई सोने को
रात की नींदें भी झपकी सी
खाली कोना रोने को,
छत का कलेज़ा टूट चूका है
बर्तन खाली बिखरा सा !! 

सुबुक-सुबुक कर बच्चे सोये,
पेट दबाये घुटनों में
शायद खाना अब मिल जाए
आँखों के घर, सपनों में
सपना शायद ठीक ही होगा
चेहरा उनका निखरा सा !! 

घर की इज्जत, घर-घर जाकर
बरतन से बातें करती
दो-दो पैसे जोड़-तोड़ कर
दिन का नित सौदा करती
आज थकी सी बैठी कबसे
लगता दिन कुछ ठहरा सा !! 

घर-बरतन सब गिरवी रख कर,
घर लाया में कुछ पैसे
बोतल भी एक साथ मैं लाया,
पी ली आज न कभी जैसे
बरसों बाद था चैन से सोया
सपना जैसे सुनहरा सा !! 

आँख खुली तो, घर के बाहर
भीड़ थी, और कुछ बातें भी
कुछ थे मुझको कोस रहे और
कुछ कहते थे अभागे भी
बेदम मेरी देह पड़ी थी
दब लकड़ी में पसरा था !! 
इंसां की बदलती तस्वीरें
एक रंग नहीं कुछ ठहरा सा ! 
कल गंगाजल था कलश भरा
अब गंदाजल कुछ बिखरा सा !! 
सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - २१/०६/२०११ 

Thursday, June 16, 2011

भूमि पुत्र !!! Bhoomi Putra !!!


भूमि पुत्र !!!
है धन्य कृषक, वो भूमिपुत्र, 
धन अन्न का जिसने उगाया है,
भूख से व्याकुल मानव को,
दे अन्न उसे हर्षाया है !!
ये किस्मत है, ये हिम्मत है, 
ये शक्ति है, इस भूमि की, 
यहाँ खून पसीना एक समझ, 
पानी सा इसने बहाया है !! 
ये मेहनत का फल है भाई, 
ये प्रकृति की है करुनाई, 
जल सींच-सींच जो बंजर भी, 
हो हरित यहाँ लहराया है !!
है वो निर्धन, पर जन का धन, 
धान के रूप उगाया है,
खुद दो रोटी को है भूखा, 
भर पेट देश को खिलाया है !!
है धन्य लाल वो माटी का,  
जिससे कि हिंद का लाल पले,
एक ले बन्दूक है  डटा  हुआ,  
एक ने हल काँधे उठाया है !!
सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - १७/०६/२०११ 

Tuesday, June 14, 2011

पलायन की पीड़ा - "एक घर की अंतर व्यथा" (Palayan Ki Peeda)


























प्रिय मित्रो,
सुर्यदीप का सादर नमस्कार !!!

अभी कुछ दिन पहले, पहाड़ गया था, अपनी जन्म भूमि, बहुत ही मनभावन, पवित्र जगह है ये देव भूमि, उत्तरांचल. वहां देखा कि बहुत अधिक पैमाने में पलायन किया गया है, छोड़ कर गए घरों की हालत बहुत ही जर्जर है, बस उन्हीं जर्जर घरों से गुजरते हुए, उन घरों की पीड़ा को सुना, बहुत कुछ कह रहे थे..... और अभी भी उन्हें उम्मीद है....कि उनमें रहने वाले फिर से आयेंगे...और....उन्हें संवारेंगे....यद्यपि ये समस्या हमारे पहाड़ों में ही नहीं...अपितु हर एक अविकसित या अल्पविकसित गाँव की है, बेहतर रोज़गार, उपचार और शिक्षा पाने के लिए आये दिन पलायन शहरों की ओर अनियंत्रित ढंग से हो रहा है.... इसी व्यथा को शब्दों में पिरोकर आपके सामने रख रहा हूँ......शायद किसी एक घर का भी भला हो सके..... 

पलायन की पीड़ा - "एक घर की अंतर व्यथा" 

याद है मुझको
मुझ पत्थर के आँगन में भी
पहली खुशियाँ आईं थी,
कोना कोना था रोशन मेरा,
शब्दों ने शहनाई बजाई थी....
बाप ने पहली पगार पर ही,
मेरी हर दीवार रंगाई थी,  
बचे खुचे पैसों से फिर
माला जगमग लगवाईं थी
शायद आज था जनम मेरा,
तो पूजन की तैयारी थी,
टक टक करती घोडा गाडी
धोती वाले को ले आई थी,   
और माँ ने मीठी पूरी की
थाली एक सजाई थी....
कुछ उस धाता को दी थी
कुछ धोती वाले को खिलाई थी,
सब कुछ कितना सुन्दर था
प्यारा संसार मेरे अन्दर था
भैया की क ख ग से लेकर
बहिना के गीतों का मंदिर था
बाहर आँगन एक बगीचा था
आम का पेड़ वो कुछ नीचा था
थी झरने की कल कल कोने में
संग पप्पी का एक बच्चा था
सुबह सुबह वो गायों का,
रंभाना अच्छा लगता था
मंदिर की घंटी की टन टन से
माँ का मुझको जगाना भाता था,
ठन्डे-ठन्डे पानी से और 
गौधन से रोज़ नहाता था
फिर चावल और दाल की गंध से
पेट मेरा भर जाता था
बाबु जी एक छड़ी कोट ले
दफ्तर की ओर निकलते थे
आते जाते कई लोग उन्हें,
राम -राम कह जाते थे
भैया तो खाकर तुरत ही
गोद मेरी सो जाता था
बहिना का सोना, सब निपटाकर
माँ के साथ ही होता था
जब सब सो जाते गहरी नींद में
तब मुझको भी सोना भाता था
पर तब दरवाजे पर,
बाबु जी का आना होता था,
उनके आते ही मेरे भीतर का
एक कोना रोने लगता था
उनका उदास सा कुछ चेहरा
मुझसे छिपाए नहीं छिपता था
जाने क्या थी बात कोई
कुछ बोल नहीं वो पाते थे
माँ के कुछ पूछने पर भी
बात को हँस टाल जाते थे
यूँ ही दिन कुछ गुजर रहे थे
कुछ हँसना कुछ रोना था
पर अनजाने डर से घबराया
मेरे मन का एक कोना था
एक शाम को बाबू जब घर लौटे
थके थके से खाट पे लेटे,
माँ ने पुछा, क्या है हाल
चेहरा क्यों लगता बेहाल,
बोले घर ये छोड़ना होगा
हमको शहर अब चलना होगा
गायों को बेच-बाच के
परदेश गुजर करना होगा
बस अब ये घर छोड़ना होगा,
मेरी तनख्वाह है थोड़ी सी
कैसे बच्चे रह पायेंगे
कैसे होंगे उनके सपने पूरे
शिक्षा से वंचित जब हो जायेंगे,
कब तक करोगी तुम भी काम,
दिन भर तो खेत, और घर का काम,
बस कुछ भी मैं कर जाऊँगा
अब शहर की ओर ही जाऊँगा,
सुन ये पीड़ा, और ये कथा,
मन था विचलित, दुःख अथाह
एक कंप सा मन में हो बैठा
खिड़की दरवाजे बंद कर मैं,
खुद एक कोने में जा बैठा
क्या अब न गूंजेगी शब्दों की
किलकारी कोई गीतों की
क्या अब होगा सन्नाटा सा,
क्या अब मैं रहूँगा एकाकी
क्या अब न रहेगी गायों की
रंभाने की आवाज़ यहाँ
क्या अब न बहेगा ये झरना
या फल फूलों के खेत यहाँ,
सोच सोच के ना जाने कब,
पलकें मेरी भीग गई
बाहर बरसात थी बहुत अधिक,
ये रात भी यूँ ही बीत गई
सुबह सुबह ही बाबू ने जब 
एक आवाज़ लगाईं थी
शायद गायों को था बेच दिया
अब खेतों की बोली लगाई थी
कुछ ही पल में सब ख़त्म हुआ,
मेरा हर सपना भस्म हुआ
माँ बोली ये घर ना बेचूंगी
जब बच्चो से होगी फुरसत,
तब राह यहीं की देखूंगी
बाबू ने था ये मान लिया
फिर अपना सामान लिया,
कर मुझको कैद मेरे भीतर,
शहर की ओर प्रस्थान किया
उस रोज़ मैं रोया बहुत, सिर  
अपनी ही दीवारों से टकराकर
था फिरता पूरे घर-घर में,
था सहमा किसी को ना पाकर
उस रोज़ मैं भूखा सोया था
क्योंकि चूल्हा भी तो रोया था
कई दिनों के बाद मेरे संग
आज कोई ना सोया था
धीरे- धीर ये रात गई
क्योंकि लोरी भी माँ के साथ गई
सुबह जब मैंने एक खिड़की खोली
देखा की भोर बहुत होली
न मंदिर की घंटी बोली
न गायों की छूटी बोली
मन मेरा फिर से सुबक गया
फिर से कोने में जा दुबक गया,
धीरे- धीरे दिन गुजर गए
मैं भी था जिन्दा बसर किये
था मुझको माँ का भी इंतज़ार,
रक्खा था अब तक खुद को संवार
दिन बीते- हफ्ते बीते, और 
बीत गए पूरे दो साल
कुछ भी ना मालुम था मुझको
माँ, बाबू और बच्चों का हाल
कुछ दूर पड़ोस में एक दिन,
कुछ हलचल सी सुनाई दी
शायद कुछ लोग थे रहने आये यहाँ
तो शंख की ध्वनी सुनाई थी,
दीवारों पर से कान सटाए,
बात मैं उनकी था सुन रहा
सहसा आँखे थी चमक उठी
कोई माँ-बाबू के हाल था कह रहा
कुछ और समीप मैं कान लगा,
बातें उनकी अब सुनने लगा,
एक बोला कि बाबू जी का
सब कुछ अच्छे से हो गया
बच्चों को शिक्षा अच्छी मिली
और माँ ने एक घर नया लिया
बाबू का काम है चल निकला,
अब वो इधर ना आयेंगे
सब कुछ सामान जुटा उधर
वो वहीँ अब बस जायेंगे,.
सुन ये बातें मैं टूट गया
आँखों से पानी फूट गया
कुछ पल के लिए सन्नाटा था
दिल डूबा-डूबा जाता था
सारी उम्मीदें थी टूट गई,
खुशियाँ थी मुझसे रूठ गई
अब मैं एकदम से तनहा था
जीवन जीकर ही सहना था
कुछ दिन में ही यौवन रूठ गया,
एक कोना मेरा टूट गया
फिर सर पर हुई पानी की मार,
ओलों से टूटी मेरी दीवार
फिर सर भी क़दमों पर आ गिरा
फिर टूट के मैं भी बिखर गया
अब बस दो हाथों से चलता हूँ
बिन छत के मैं रहता हूँ
संग चूहों के ही रहता हूँ
रातों को अक्सर डरता हूँ
शायद अब भी हैं कुछ साँस बची
या फिर कोई उम्मीद बची
क्या माँ फिर से आएगी
क्या उजड़ा घर वो बसाएगी...
क्या माँ तू फिर से आएगी.....
क्या माँ तू फिर से आएगी....... 
सुर्यदीप अंकित त्रिपाठी - १४/०६/२०११